होकर मैं फ़िक्रमंद तो , रोता नहीं कभी ,
आलम हो दिल में जब खुशी , का फूट रोऊँ मैं ।।
तूफ़ान जब भी आए तो , घोड़े मैं बेचकर ,
चादर को लंबी तान भर , खर्राटे सोऊँ मैं ।।
बेशक़ मेरा रवैया है , जीने का अटपटा ;
छालों भरी ज़ुबाँ हो तो , खाऊँ मैं चटपटा ;
वैसे तो अपने सर पे मैं , टोपी भी ना धरूँ ,
आफ़त के वक़्त मानिए , सच कोह ढोऊँ मैं ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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