■ मुक्तक : 984 – इल्तिजा

मछली सा तैरूँ बाज़ों , सा उड़ दिखाऊँ उनको , बन जाऊँ केंचुआ या , इक कामयाब ग़ाज़ी ।। सच कह रहा हूँ चाहे , जिसकी क़सम खिला लो , मैं जीत कर बता दूँ , हारी हर एक बाज़ी...Read more