मछली सा तैरूँ बाज़ों , सा उड़ दिखाऊँ उनको ,

बन जाऊँ केंचुआ या , इक कामयाब ग़ाज़ी ।।

सच कह रहा हूँ चाहे , जिसकी क़सम खिला लो ,

मैं जीत कर बता दूँ , हारी हर एक बाज़ी ।।

मजनूँ सा ख़ाक सहरा की छानने मैं चल दूँ ;

फ़रहाद सा पहाड़ों को काटने में चल दूँ ;

बस एक बार मेरी , हो जाए इल्तिजा पर ,

मुझसे वो फिर महब्बत , करने को यार राज़ी ।।

( ग़ाज़ी = नट , रस्सी पर चलने का करतब दिखाने वाला )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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