■ मुक्तक : 973 – याद

दुनिया की हर एक ख़ुशी , दुनिया भर का ग़म हो जाना ।। हँसते-हँसते मौसम का फिर , रोता आलम हो जाना ।। ऐसा ही होता है मेरे , साथ क़सम से बाज़ दफ़ा , याद तुम्हारी आना और बस...Read more

मुक्तक : 972 – छुरा

सीने से चाँप रखने , वाले मुझे हमेशा , हैरान हूँ , रहे हैं , क्यों आज दुरदुरा वो ? जो मानते थे कल तक , इक फूल नर्मो-नाज़ुक , मेरी उसी क़लम को , कहते हैं अब छुरा वो...Read more

मुक्तक : 971 – छोटा

जो बरबटी से कद्दू , होता चले उसे फिर , तुम ही कहो , न मोटा , तो और क्या कहेंगे ? जिस भी घड़े में आए , बस दो गिलास पानी , उसको कहें न लोटा , तो और...Read more

मुक्तक : 970 – कलमा

उसे बैठ कर लिख रहा हूँ मैं यूँ ख़त , कि लिखता है जैसे कोई नाम रब का ।। उसे प्यार करता हूँ कुछ इस तरह से , कि करता है जैसे कोई काम रब का ।। रहूँ सख़्त मस्रूफ़...Read more

मुक्तक : 969 – ग़ज़ल

होठों को पंखुड़ी न कहूँगा गुलाब की , आँखों को जाम का न बदल कह सकूँगा मैं ।। बोलूँगा मैं कनेर को फिर तो कनेर ही , चंपा को भूलकर न कँवल कह सकूँगा मैं ।। लफ़्ज़ों में मेरे दिखती...Read more

मुक्तक : 968 – ख़ुदकुश ( आत्महत्या करने वाला )

नाकामियों से अपनी , इक रोज़ यास में भर , सोचा कि आज तो कुछ , करके ही मैं रहूँगा ।। बेकार हूँ अगर मैं , तो फिर कोई बताए ; अब और आगे मर-मर , जीकर मैं क्या करूँगा...Read more