मुक्तक : 967 – मैख़ाना

  [ चित्र Google Search से साभार ] कभी भी कम नहीं ज्यादा से ज्यादा चूमने जाता ।। मसालेदार छूने और सादा चूमने जाता ।। न हो हैरान सचमुच ही कभी पीनेे नहीं बस-बस , मैं मैख़ाने में बोतलबंद बादा...Read more

मुक्तक : 966 – तुम बिन

बर्फीली चट्टानों पर जा-जा लेटे दुनिया , पर अंगारों को छाती से चाँप रहा हूँ मैं !! लोग उघाड़े सब फिरते फर-फर झलते पंखे , स्वेटर पहने शॉल बदन पर ढाँप रहा हूँ मैं !! मेरी सुर्ख़ अँगीठी , मेरी...Read more

■ मुक्तक : 965 – त्रिशंकु

  मंज़िल यों ढूँढता हुआ , भटक रहा हूँ मैं ।। शायद लगेगा आपको , मटक रहा हूँ मैं ।। मेरे लिए ज़मीं कहाँ , न आस्मान है , बनकर त्रिशंकु सच कहूँ , लटक रहा हूँ मैं ।। -डॉ....Read more

मुक्तक : 964 – गाँव

क्या हो गया कि मुझको हर एक चीज़ आजकल , सच चाहिए तो चाहिए बस उसके गाँव सी ? जब से मिला हूँ उससे लगे वो ही कूकती , करते हैं और सब तो महज काँव-काँव सी ।। उसकी गली...Read more

मुक्तक : 963 – हाय !

मेरी आँखें न थीं , फिर भी मेरे लिए , दुलहनों सी वो सजती-सँवरती रही ।। जानकर भी कि मैं , एक पत्थर हूँ वो , मुझसे बेइंतिहा , प्यार करती रही ।। लोग कहते हैं घायल थी मेरे लिए...Read more