■ मुक्तक : 986 – ख़्वाब

कहते हैं लोग सूरत , यों है करीह मेरी , तकते ही मुझको उनको , आ जाएँ मितलियाँ ही ।। करते हैं बात मुझसे , ऐसे कि जैसे कोई , दे दर खड़े भिखारी , को तल्ख़ झिड़कियाँ सी ।।...Read more