कहते हैं लोग सूरत , यों है करीह मेरी ,
तकते ही मुझको उनको , आ जाएँ मितलियाँ ही ।।
करते हैं बात मुझसे , ऐसे कि जैसे कोई ,
दे दर खड़े भिखारी , को तल्ख़ झिड़कियाँ सी ।।
फिर भी तो इश्क़ ही का , है ख़्वाब जबकि सचमुच ,
यह बात मैं बख़ूबी , हूँ जानता कि मुझसे ,
फ़ौरन महब्बतों के , बस नाम से ही सारी ,
बच-बच के भाग जातीं , बदशक्ल लडकियाँ भी ।।
( करीह = घिनौनी , तल्ख़ = कड़वी )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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