■ मुक्तक : 987 – दौर-ए-बेरोज़गारी

बेरोज़गारियों का , कैसा ये दौर ऊँची- तालीम लेके वाजिब , मिलता न काम कोई ? इंजीनियर लगाते , ले-ले के ठेला फेरी , चिल्लाते ले लो आलू , भिंडी-धना-तरोई !! कैसा है रे ज़माना , पेट अपना पालने को...Read more