तुम क्यों ये चाहते हो ,ठीक उनके कान में जा ,
खाई को गिरि ,रसातल ,को तूल बोल दूँ मैं ?
संसार भर के आगे ,किस रौ में बह अकारण ,
मझधार को नदी की ,थिर कूल बोल दूँ मैं ?
अंधों के हस्ति जैसा ,अनुमान बस लगा ज्यों ;
रख गिद्ध-दृष्टि फिर भी ,दृढ़ता से चीखकर क्यों ;
राहों पे चलते मेरे ,पाँवों में नित्य गहरे ,
चुभते नुकीले काँटों ,को फूल बोल दूँ मैं ?
( तूल =व्योम ,आकाश / थिर =स्थिर / कूल =किनारा )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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