कैसा गुनाह हमसे , ये आज हो गया रे ?
बोतल का वो हलाहिल , हमने दवा बताया ।।
नुक़सान के सिवा जो , कुछ भी नहीं था उसको ,
हमने बड़े यक़ीं से , ख़ालिस नफ़ा बताया !!
इस दिल को सच नहीं था , टुक एतबार उस पर ;
तुम पर था तो तुम्हारे , कहने में आज आकर ;
सब पूछते थे क्या है ? वह कौन है ? तो हमने ,
आँधी न कहके उसको , बादे सबा बताया ।।
( बादे सबा = बाद-ए-सबा , प्रातः समीर )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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