सिर पे न उसके कोई , दिखता पहाड़ लेकिन ,
कहता है बोझ भारी मैं रोज़ ढो रहा हूँ !!
आँसू कभी लुढ़कते , गालों पे उसके कब पर ,
हँस-हँस के बोलता है , दिन-रात रो रहा हूँ ।।
करता है आजकल वो , लोगों से उलटी बातें ;
बोले सफ़ेद काले , को दिन को कहता रातें ;
अपने ही ख़ूँ को बेशक़ , सींचे है अपने ख़ूँ से ,
पर बोलता है पत्थर , पे बीज बो रहा हूँ !!
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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