वो बेदिली से मुझको , दिल से लगे हटाने ।।
मैं भी न चाह कर भी , उनको जुटा भुलाने ।।
मैं साँप हौले-हौले , बनता नया-नया सा ,
तेज़ी से हो रहे हैं , वो नेवले पुराने ।।
तैयार ज्यों ही अपना , करने लगूँ जनाज़ा ,
त्यों ही वो अपनी डोली , भिड़ जाते हैं सजाने ।।
कोई बराबरी अब , हम में न रह गई है ,
मैं बन चुका लतीफ़ा , वो हो गए तराने ।।
कुछ ऐसे हो गए हैं , हालात अब हमारे ,
ख़ुशियाँ भी हमको लगता , आती हैं बस रुलाने ।।
कल ही किया गया है , हमको अलग-अलग पर ,
लगता है हमको बिछड़े , बीते कई ज़माने ।।
है आख़री तमन्ना , इक आख़री दफ़्आ बस ,
मैं रूठ जाऊँ फिर से , वो आएँ फिर मनाने ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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