करूँ क्या मैं ? लेकिन ये सच है शुरू से ,
बुरी सुह्बतें मुझको लगतीं हैं अच्छी ।।
न हरगिज़ जिन्हें चाहे करना ज़माना ,
वो सब हरक़तें मुझको लगतीं हैं अच्छी ।।
सभी की पसंदों का दर्जा है आला ,
हर इक शख़्स का शौक़ उम्दा-निराला ,
ख़ुदा झूठ मुझसे न बुलवाए लोगों ,
बुरी आदतें मुझको लगतीं हैं अच्छी ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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