वो मेरे लिए क्यों तड़पता नहीं है ?
क्यों मिलने को इक पल न बेचैन होता ?
चलो माना हँसता है महफ़िल में हरदम ,
तो तनहाई में भी कभी क्यों न रोता ?
मुझे चाँद अपना जो कहते न थकता ,
जो ख़ुद को मेरा ही चकोरा समझता ,
मैं जागूँ बिछड़ उससे फूलों पे शब-शब ,
वो आराम से कैसे काँटों पे सोता ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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