जाने किस हाल में है , है वो ख़ुश कि है ग़मगीं ?

जाओ ढूँढो उसे , छुपा नहीं वो खोया है ;

सच न देखूँगा और कुछ भी मैं ज़माने में ,

अब तो आँखों से उसका ही नज़ारा लूँगा हाँ ।।

उसका मुझसे न मिलने आना ये बताता है ,

उसके पाँवों में कितनी बेड़ियाँ पड़ी होंगीं ?

ऐसे कैसे मैं मान लूँ कि वो न आएगा ?

मैं ज़रूर उसका इंतज़ार नित करूँगा हाँ ।।

एक कहता है ग़ैर का वो हो चुका अब तो ,

दूजा बोले कि मुझसे अब वो ऊब बैठा है ,

सब उसे बेवफ़ा का नाम खुलके देते हैं ,

मैं मगर उसको अब भी देवता कहूँगा हाँ ।।

उसको देना ही चाहा , उससे कुछ नहीं चाहा ;

मैंने सचमुच किया है उससे इश्क़े लाफ़ानी ।

उसका मैं क्या हूँ ये मुझे नहीं पता लेकिन ,

वो मेरे वास्ते है ज्यों समक को हो पानी ।

मेरा बेशक़ है लाइलाज मर्ज़ पर तै है ,

मेरे मरने की वज़्ह ये कभी नहीं होगी ;

मेरे जीने को सच न साँस वो जरूरी है ,

वो है जब तक कि ज़िंदा मैं नहीं मरूँगा हाँ ।।

( इश्क़ ए लाफ़ानी = अमर्त्य प्रेम , समक = मछली )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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