■ मुक्तक : 998 – भँवरा

तुझको बनते फूल जब-जब देखता , हाय भँवरा ही हुआ जाता हूँ सच ।। तुझको छूते ही गुलाबों-मोगरों – का मैं गजरा ही हुआ जाता हूँ सच ।। रू-ब-रू होता है मेरे जब भी तू ; कम से कम उस...Read more