■ मुक्तक : 1000 – ख़्वाब

सर पे गारा-ईंट-पत्थर-ख़ाक ढोते ।। सिर्फ़ जो दो जून की रोटी को रोते ।। देख कर पर्वाज़ भरते पंछियों को , क्यों वे उड़़ना चाहें जिनके पर न होते ? -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more