नहीं कोई चिराग़ वर्ना आँधियों में क्यों ,
भले ही फड़फड़ा के फिर भी जल रहा हूँ मैं ?
कटे नहीं है मेरे पैर तब तो काँटों पे ,
पहन के जूते ख़ूब तेज़ चल रहा हूँ मैं ।।
मैं गर न होता बर्फ़ तो मैं सर्द होता क्या ?
न होता शोला जो भला तो गर्म होता क्या ?
ज़माना हो रहा क्यूँ हैराँ मेरी बातों से ?
बदल रही है दुनिया तो बदल रहा हूँ मैं ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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