[] नज़्म : 2 – काला बंदर

मैं इक फूल की नर्म सी पंखुड़ी था , वो बिच्छू के डंकों सा बेरी का काँटा ।। चपत था मैं इक प्यार की गाल पर वो , बहुत ज़ोर का एक मुक्के सा चाँटा ।। मैं सचमुच शहद या...Read more