मैं इक फूल की नर्म सी पंखुड़ी था ,
वो बिच्छू के डंकों सा बेरी का काँटा ।।
चपत था मैं इक प्यार की गाल पर वो ,
बहुत ज़ोर का एक मुक्के सा चाँटा ।।
मैं सचमुच शहद या तरोताज़ा शर्बत ,
वो बिलकुल करेले या फिर नीम का रस ।।
मैं बोली में कोयल से , बुलबुल से मीठा ;
वो गाता भी लगता गधा रेंकता बस ।।
हर इक बात में मुझसे था ठीक उलट वो ,
अगर मैं था तालाब वो इक मरुस्थल ।।
मैं पर्वत शिखर था तो वो गहरी खाई ,
मैं मैदाँ था तो वो घना एक जंगल ।।
मिले जब थे पहली दफ़्आ यूँ लगा था ,
मैं राधा हूँ वो मेरे गोकुल का कान्हा ।।
अगर हूँ मैं मजनूँ तो वो मेरी लैला ;
जो मैं हीर वो तख़्त हज़ारे का राँझा ।।
यक़ीनन मेरा इश्क़ था तेज़ अदरक ,
मगर हाय देखो तो मेरा मुक़द्दर ;
जिसे मैंने चाहा ख़ुदा से भी बढ़कर ,
वो था लाल मुँह वाला इक काला बंदर ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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