नहीं चाहता जिनकी सूरत भी देखूँ ,
उन्हीं के है दीदार का हुक़्म मुझको !!
जिन्हें चाहता हूँ कि बस मार डालूँ ;
मगर उनसे ही प्यार का हुक़्म मुझको !!
तुम्हें क्या पता क्यों मैं जाता उधर हूँ ?
मुझे जिस जगह से नहीं टुक मोहब्बत ;
तुम्हें क्या पता ? खाइयाँ मुझको प्यारीं ;
मगर रात दिन में चढ़ूँ ऊँचे पर्वत !!
न समझोगे तुम आदमी होके क्यों मैं ;
बड़े शौक़ से घास को चर रहा हूँ ?
जहाँ लोग आराम फ़र्मा रहे हैं ;
मैं हर वक़्त उठा कुछ तो कुछ धर रहा हूँ ।।
कहाँ तक गिनाऊँ कि मैं काम कितने ;
जो करना ना चाहूँ मगर कर रहा हूँ ?
मैं हर रोज़ जीने की जिद्दोजहद में ;
मैं हर रोज़ कितनी दफ़्आ मर रहा हूँ ?
बहुत पूछते हो कि क्या राज़ इसका ?
तो खाकर क़सम सच ही बतला रहा हूँ ;
बहुत भागती ज़िम्मेदारी से दुनिया ;
निभाने को मैं फ़र्ज़ पगला रहा हूँ ।।
सुनें ग़ौर से या करें अनसुनी सब ;
गुलूकार हूँ इसलिए गा रहा हूँ ;
पढ़े या न मुझको पढ़े कोई लेकिन ,
क़लमकार हूँ तो लिखे जा रहा हूँ ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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