इक हिमालय को सबने मिलके अपनी ताक़त से ,
जा से सरकाने ज़ोर-ज़ोर से हला डाला ।।
सख़्त पत्थर सा बर्फ़ आफ़्ताब से मिलकर ,
देखते-देखते ही मोम सा गला डाला ।।
सबही आए थे सोचकर गुनाह करने को ;
एक लेकर हुजूम सब तबाह करने को ;
पर कहाँ जानते थे वो ये बात अंदर की ?
मैं तो पहले ही लाश था , उसे जला डाला ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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