सचमुच न जानते थे , बारे में इश्क़ के जब ;
थी उम्र कोई अपनी , मुश्किल से दस या बारह ;
थी उस हसीं की लेकिन , पूरे बरस अठारह ;
करने लगे थे उससे , हम प्यार वाले करतब ।।
तकते ही उसको को आते , जाते कहीं से छिपकर ;
लगते थे गाने गाना , सीटी कभी बजाने ;
करते थे उसका पीछा ; कुछ साथ उसका पाने ;
हाथों में हाथ उसका , हरगिज़ न ले सके पर ।।
आँखों के सामने ही , वो हो गई परायी ,
पूछो न दिल के कितने , टुकड़े हुए हमारे ;
आँखों से आँसुओं के , निकले हजार धारे ;
फिर भी न उसने हम पर , नज़रे करम उठाई ।।
ग़ुस्से में हमने उसको , झट भूलने की ठानी ।।
उसके बिना भी सुख से , जीने की बात मानी ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *