आज वो मुझसे रूठ चले किस तरह बुलाऊँ ?
आज मनाने से भी वो वापस आ न सकेंगे ।
प्यास वो उनको आज नहीं फिर क्या मैं बुझाऊँ ?
पेट भरा कुछ भी जो परोसूँ खा न सकेंगे ।।
सोचूँ यही आख़िर वो मुझे कब जान सकेंगे ?
मैं तो उन्हें पहचान के ही कुछ भी न कहूँ अब ;
कह भी अगर दूँ तो भी अभी क्या मान सकेंगे ?
उनके मुताबिक़ ख़ुद को मैं पूरा ढाल रहूँ अब ।।
उनके सभी नखरे मैं तड़प चुपचाप सहूँ अब ;
उनने मगर मानी न मेरी इक भी रे गुज़ारिश ;
सोच लिया जज़्बात में क्यों इकतरफ़ा बहूँ अब ?
ख़ूब करें मुझ पे वो सितम ना एक नवाज़िश ।।
इश्क़ नहीं बस यार की ख़िदमत और ग़ुलामी ।।
मैं न कहूँ सब क्यों न भरें इस बात पे हामी ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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