तुम सब लोग मुझे समझो पूरा पागल इक ,
तो इसमें कुछ भी न तुम्हारी यार ख़ता है ।
है तुमको पूरा हक़ मुझको रोज़ करो दिक़ ,
नाखूनों से कौन कुआँ खोदा करता है ?
मुझको बेइज्ज़त करने या पहुँचाने दुख ,
जो जी चाहे लो तुम मेरा नाम चिढ़ाने ;
गर मिलता हो तुमको इसमें थोड़ा भी सुख ,
अपनी ठंड मिटाने मुझको आओ जलाने ।।
जो करता मैं सोच समझकर ही करता हूँ ,
बिस्तर एक बगल रख काँटों पर ही सोऊँ ;
पीने के पानी को चलनी में भरता हूँ ,
जब न भरे बच्चे से तेज़ बिलखकर रोऊँ ।।
हो सकता है बुलबुल में इक बाज़ छुपा हो ।।
भीतर सब ज़ाहिर हो बाहर राज़ छुपा हो ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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