कहते हैं कि मिटने वाले की गर कभी जाए निकल –
बददुआ तो करके वो रख दे सभी कुछ हाय फ़ना ।
सचमुच में तो क्या ख्व़ाबों में तलक अपना तू महल ,
बस क़ब्र पे मेरी बराए मेह्रबानी न बना ।।
मत यार मेरी बर्बादी का कोई जश्न मना ।
मेरा क़त्ल किया किसने जानूँ ला कान इधर ,
दे हाथ तेरा न दिखाई मगर मेरे ख़ूँ में सना ;
फिर भी मैं तुझे मेरा यार है तू यही सोचके कर –
रखता हूँ मुआफ़ अरे वर्ना तू ही सोच अगर ,
मेरी रूह से जाय निकल कोई हाय तो क्या होगा ?
मेरा यार जवानी में हाय तड़प के न जाएगा मर ?
फिर मेरी बगल में ही तू भी मुझी सा दबा होगा ;
पर फ़िक्र न कर बस गोर मेरी मत तोड़ ढहा ।।
यह सोचके ही कुछ दिन तो तेरे मैं दिल में रहा ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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