अंधा हूँ छू पूँछ को रस्सी कह देता हूँ ।।
पग टटोल गज के जो उनको बोलूँ खंभा ।।
रबड़ी यदि बिन चक्खे लस्सी कह देता हूँ ,
क्यों तुझको होता है यह सब देख अचंभा ?
बिन दाबे चिकना-गीला पत्थर का ढेला ,
बस छूकर बिन देखे ही कोमल कह देता ।।
एक मूक कौए का तक-तक रंग अकेला ,
मैं बहरा उसको सीधे कोयल कह देता ।।
बल खाई रस्सी अँधियारे में यों लगती ,
जैसे सर्प कुण्डली मारे चुप बैठा हो ।।
यदि झोंके से हिल भी जाती या डुल पड़ती ,
ऐसा लगता ज्यों उसमें वो छुप बैठा हो ।।
कुछ पक्की दिखने वाली कच्ची होती हैं ।।
अनुमानित सब चीज़ें कब सच्ची होती हैं ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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