क्या करूँं अब हो गई जो मुझसे भारी भूल ?
रख सका अपने न दिल में मैं उसे आबाद ।।
अब करूँ भी तो नहीं आती है उसकी याद ,
इस क़दर उसको भुलाने में रहा मशगूल ।।
क्या हुआ वादा ये जो करता था उससे रोज़ –
” भूलकर तेरा न छोड़ूँगा कभी भी हाथ ,
साथ ही ज़िंदा रहूँगा जब मरूँगा साथ ।। ”
तोड़कर क़समें भी क्यों होता नहीं मैं होज़ ?
सबको बतलाती है मेरा अस्ल क्या क़िरदार ?
सामने दुनिया के पूरा खोल पड़ती राज़ ।।
बेख़तर हो बोलती वो मुझको धोख़ेेबाज़ ।।
सर झुका जाता है मेरा सुनके यह सब यार ।।
जेह्नोदिल से अपने मक़्सद को भुला दिलदार ,
पाके मंज़िल भी लगे ज्यों हूँ सड़क पर यार ।।
( होज़ = चकित / बेख़तर = निडर )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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