ये मुझ सँग आजकल ज्यों हादसा ही घट रहा ;

मेरा महबूब कुछ बरताव ऐसा कर रहा ।।

मुझे पहचानने से बज़्म में नट-नट रहा ;

जो पहलू में मेरे ख़ल्वत में शब-शब भर रहा !!

नहीं था वो कभी ऐसा कि दिखता आज जो ;

बहुत हैरान हूँ मैं देख कर उसके तो ढब ,

कि मुझको मानता था जब कभी सरताज वो ,

तो मुझसे सच में आता था अदब से पेश तब ।।

अगर कोई शिकायत है तो खुलकर बोल दे ;

पता तो हो गुनह मुझसे कि कैसा हो गया ?

न लब सिलकर रखे बेख़ौफ़ हो मुँह खोल दे ,

यूँँ ही क्यों अज़्नबी , बदख़्वाह जैसा हो गया ?

मेरी क़िस्मत मैं जिसमें देखता था अपना रब ;

रहा होगा कभी लेकिन रहा मेरा न अब ।।

( बज़्म = सभा ,  ख़ल्वत = एकांत , बदख़्वाह = अहितचिंतक )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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