होता कहीं अगर वह , बेहद न ख़ूबसूरत ,
होता तो प्यार उससे , इतना ज़बर न होता ।
होता वो दोस्त मेरा , दिलबर मगर न होता ,
होती भले ही मुझको , महबूब की ज़रूरत ।।
पूछा जो होता तुमने , देकर क़सम न अपनी ,
ऐ दोस्त मरते दम तक , यह राज़ दिल में रहता ।
यों कोई मुझसे कितना , भी पूछता , न कहता ;
तुमसे भी मुझको शायद , यह बात थी न कहनी ।।
जब जान ही गए हो , तो उससे तुम न कहना ,
वर्ना वो इश्क़ मेरा , जिस्मानी मान लेगा ;
मुझको इसी बिना पर , तजने की ठान लेगा ।
मुझको बग़ैर उसके , हरगिज़ न अब है रहना ।।
मैं क्या करूँ मुझे सच-सच बोलने की है लत ?
जैसा भी है मगर है , उससे मुझे महब्बत ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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