जब-जब जो तू ने माँगा , मैंने दिया है तब तब ,
लौटा सके तो वो-वो , लौटा दे मुझको लाकर ,
रहता जहाँ पे मैं हूँ , उस ही जगह पे आकर ,
तिनका भी छोड़ना मत , देना पहाड़ भी सब ।
तोहफ़ा नहीं दिया था , मैंने उधार दी थी ,
मत सूद दे भले ही , चल अस्ल तो चुका दे ,
मुश्किल में हूँ कि मुझको , मेरा ही सामाँ ला दे ,
जिसकी की वापसी की , तूने क़सम भी ली थी ।
किस वज़्ह से तेरी अब , नीयत बदल गई है ?
ईमान का तो तू था , दिन रात का पुजारी ,
बंदा था तू वफ़ा का , सच से थी तेरी यारी ,
इक गाय लोमड़ी में , क्यों आज ढल गई है ?
सच क़र्ज़ दोस्त बनकर , लेना नहीं था तुझको ।
सच क़र्ज़ दोस्त होकर , देना नहीं था मुझको ।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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