लोग दक़्यानूसी कहते , थे सभी जिसको , मेरी ,

अज़ सरापा आँख को , बिलकुल नवी लगती रही !!

जाने थी किस गाँव की मैं , पूछ भी पाया नहीं ,

हाँ ! अदाओं से बड़े से , शह्र की लगती रही !!

जो भी कुछ करती थी लगता , था कि सब मा’क़ूल है ।

भूलकर भी उसके हाथों , से न होती भूल है ।

सोचता हूँ आज भी तनहाई में हैरान हो ,

वो सरासर थी ग़लत पर , क्यों सही लगती रही ?

( दक़्यानूसी = बहुत पुराना , बूढ़ा / अज़ सरापा = सिर से पाँव तक / मा’क़ूल = उचित ) 

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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