दिल के सिर पर मैं अकेला बोझ ढोऊँ बेशुमार ,
क्यों करूँ उमीद आए कुछ न कुछ उठाए दोस्त ?
वज़्ह है कि दर्द से कराहता नहीं हूँ यार ;
तुम तो रोना जब भी तुमको कोई ग़म सताए दोस्त ।।
मैंने पीते-पीते अपने अश्क़ सब सुखाए दोस्त ।
लोग रोने वालों के फटकते भी नहीं हैं पास ,
जाके वो चिपकते उससे जो उन्हें हँसाए दोस्त ।
देखना रहूँ न रंज में भी मैं कभी उदास ।।
मुस्कुराऊँ भर तो जानना न कोई ग़म है ख़ास ।
सर पे मान लेना तब कि गिर पड़ा मेरे पहाड़ ,
क़हक़हे लगाऊँ बात-बात पर अगर पचास ;
दुश्मनों को भी करूँ सलाम या दिखाऊँ लाड़ ।।
अपना हो कि ग़ैर ग़मज़दा सभी की नापसंद ,
बस दिमाग़ में तभी रखा है मैंने दिल को बंद ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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