फ़क़त इक दिन में गिन-गिनकर , कम अज़ कम दस दफ़्आ योंही ,
मेरे आगे न अपने हुस्न का जल्वा करो आकर !!
मुझे मालूम है गर्मी का मौसम आग बरसाता ,
है जब नल घर में तो पनघट पे क्यों पानी भरो आकर ?
इरादा इश्क़ करने का कभी मेरा नहीं लेकिन ,
मेरी जब-जब नज़र पड़ती है तुम पर ढह सा जाता है ।।
बनाकर मैंने अपना दिल जो इक पत्थर का रक्खा है ,
वो बिलकुल मोम के जैसे पिघल घुल बह सा जाता है ।।
तुम्हें क्या तुम तो चल देते हो यों झुक-झुक के पानी भर ,
कि नज़रों में मेरी क्या-क्या नज़ारे मस्त भर जाते ।।
इन्हें ख़्वाबों में खोने को न होती नींद फिर लाज़िम ,
तसव्वुर हम खुली आँखों से कैसे-कैसे कर जाते ?
करूँ क्या सामने ही घर के पड़ता दुष्ट ये पनघट ,
मगर तुम सी न पनिहारिन का हो आना यहाँ झट-झट ?
अकेली तुम यों आईं चाँद वो चमका है ईदों में ,
कि भर दी रोशनी पैदाइशी अंधों के दीदों में ।।
किसी दिन तुम निकलना सच में घर से भरने पानी ही ,
मगर हर बार याँ आ भूल ही जाना है क्या भरना ?
मैं तुमको मुस्तक़िल देखूँगा उस दिन सामने सबके ,
मेरा दीदार तुम भी बेख़तर दुनिया से हो करना ।।
क़सम फिर तोड़ दूँगा मैं मोहब्बत के न करने की ,
किसी से दिल लगाने की , किसी पे मिटने-मरने की ।।
( तसव्वुर = कल्पना / दीदों = आँखों / मुस्तक़िल = लगातार / बेख़तर = निर्भय )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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