इक इशारे पे मैं उसके क्या हुआ लँगड़ा व लूला ,

उसने मेरे प्यार को फिर ज़िन्दगी भर ना क़बूला ?

सोच में हफ़्तों-महीनों क्या मैं सालों साल से था ,

अपनी उस रूदादे ग़म को जो मरी होते ही पैदा ,

कोई भी मेरा नहीं हमराज़ जिससे कह सकूँ मैं ,

लिख रहा हूँ डायरी में इस भरोसे पर कि कुछ हो ,

चल रहा बारह महीनों से जो दिल में , कम , बगूला ।।

बस नहीं शादीशुदा , हूँ बाल-बच्चों का पिता भी ,

बल्कि उनकी उम्र भी शादी की हो बैठी मगर मैं ,

आज तक भी मेरे इज़हारे मोहब्बत पर वो उसका ,

मेरे पहले ख़त को पढ़कर फाड़ मुँह पर मार देना ,

कोशिशों पर कोशिशें दिन-रात करके भी न भूला ।।

मुझको उसकी ख़्वाहिशें , अर्मानो-हसरत सब पता थे ,

वह मुझे हरगिज़ न चाहेगी बख़ूबी जानता था ,

मैं मगर था हुस्न पर उसके फ़िदा कुछ इस क़दर सब –

भूलकर औक़ात अपनी उसको उससे माँग बैठा ;

उसने मेरी इस तलब का ख़ूब हर्ज़ाना वसूला ।।

चाहता था आँख से तस्वीर उसकी फाड़ डालूँ ,

ख्व़ाब सब डसने को बढ़ते साँप के फन से कुचल दूँ ,

वह जो दिख जाती तो कस के बंद कर लेता था आँखें ,

पर गुजर जाती तो चुप के दूर तक मैं देखता था ;

आज भी नज़रों में झूले उन नज़ारों का ही झूला ।।

पूछता हूँ क्या कोई दिल टूटकर जुड़ता नहीं है ?

इश्क़ में जो बढ़ गया क्या फिर कभी मुड़ता नहीं है ?

अब भी है कोशिश की उसको मैं सिरे से भूल जाऊँ ,

या चबालूँ ज़ह्र या फंदा गले कस झूल जाऊँ ।।

कैसे अब भोंकूँ छुरा छाती में वो जो तब न हूला ?

( रूदादे ग़म = प्रेम व्यथा का वृत्तांत / बगूला = बवंडर / हूला = भोंका )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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