इंसान को बदलना , मुश्किल से भी है मुश्किल ।।
इक बाज़ से मुझे तुम , तो कर रही हो हारिल ।।
आकर तुम्हारी बातों , में मैं बदल रहा हूँ ,
हाथी हूँ बंदरों सा , लेकिन उछल रहा हूँ ,
पत्थर मैं पा तुम्हारी , चाहत पिघल रहा हूँ ,
तुमने कहा है मुझसे ,” मुझको बनालो मंज़िल ,
ख़ुद को बदल दो मुझको , करना जो चाहो हासिल ।।”
सच्ची मुझे मोहब्बत , करती हो ये जताकर ,
हाथों से छीन खंज़र , उसमें क़लम थमाकर ,
याँ तक ग़ज़लसरा इक , शायर मुझे बनाकर ,
अब लग रहा है मुझको , तुम तोड़ने चलीं दिल ।।
मुझको बनानें फिर वो , ही ख़ौफ़नाक क़ातिल ।।
वादों को पूरा करना , तो दूर नट रही हो ,
क्या हो गया यकायक , क्यों मुझसे कट रही हो ?
मुँह चूमने के बदले , मुझ पर झपट रही हो ,
करतीं यों जिस्म घायल , होती है रूह बिस्मिल ।।
आती है मौत लेकिन , जाती है जान तिल-तिल ।।
( हारिल =हरी छोटी चिड़िया / ग़ज़लसरा =ग़ज़ल सुनाने वाला / बिस्मिल =ज़ख़्मी )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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