हर तरफ़ ये देखकर मैं हो रहा हूँ होज़ ;
लड़के सेठानी से करते इश्क़ का आग़ाज़ ,
मर रहीं बूढ़े धनी पर लड़कियाँ हर रोज़ ,
मालोज़र ही क्या मोहब्बत का है अस्ली राज़ ?
वो है हीरे की कनी मैं रास्ते की धूल ,
बेहया का फूल मैं वो इक गुले गुलज़ार ;
ऐसे कैसे बेक़रारी में ये कर दूँ भूल ,
उससे कहकर उससे करता हूँ मैं कबसे प्यार ?
मैं नहीं जाऊँगा उसके सामने बदहाल ,
कर रहा हूँ कोशिशें इस बात की दिन-रात ,
एक भिखमंगे से बस हो जाऊँ मालामाल ,
ताकि घर ले जा सकूँ उसके मेरी बारात ।।
जानता हूँ मेरी मंज़िल चाँद से भी दूर ,
पर उसे पाने की सब शर्तें मुझे मंज़ूर ।।
( होज़ = चकित , भयग्रस्त / मालोज़र = धन दौलत )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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