दर्द क्या बेरोज़गारों का वो समझेगा अरे –
जो विरासत के ख़ज़ाने पर मगन लेटा रहे ;
और वो भी जिसको रोज़ी मिल गई आराम से ;
तेरी बेकारी का किस्सा सुनके क्यों रोवे भला ?
ठीक है हलकी सी इक टोपी लगा चल वो रहा ,
और कहता है कि सर पर इक हिमाचल ढो रहा ;
उससे ही कहता है तू तुझको भी ऊपर लाद ले ;
और फिर किस हक़ से तेरा बोझ वो ढोवे भला ?
वैसे भी रोना किसी मुश्किल का हल तो है नहीं ,
औ’ न पत्थर आँसुओं से सच कहूँ पिघले कहीं ;
फिर अगर वह हँस रहा हो और हो भी अजनबी ;
तेरी ख़ातिर ग़मज़दा वो बोल क्यों होवे भला ?
तुझको हो तक़्लीफ कितनी जानता हूँ मैं मगर ,
सैकड़ों बीमार लेकिन है अनार इक ही इधर ;
सच यही है जो मिले उससे ही कर अपनी गुजर ;
हाथ आते जामुन-इमली-बेर क्यों खोवेे भला ?
सच , मिले जो काम कर तू बात मेरी मानकर ;
काम कोई भी नहीं होता है छोटा जानकर ;
ख़्वाब सच करना है तो आँखें बस अपनी खोलकर ,
हाय रे जागे हुए इंसाँ तू क्यों सोवे भला ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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