औरों को लू-लपट मुझे तो बस नसीम था ।।
लगता मुझे खजूर वो भले ही नीम था ।।
आदी अगर था मैं नशे का तो मेरे लिए ,
गाँजा-चरस था वो शराब था अफ़ीम था ।।
लगता था शक्ल से ज़रूर इक ददा मगर ,
वो एक मेह्रबान था बड़ा रहीम था ।।
मेरा था इसलिए वो जैसा भी था सच कहूँ ,
मेरे लिए वो ज़र्रा होके भी अज़ीम था ।।
बीमार यों न था कि बच न पाता मैं मगर ,
दुश्मन को मैंने अपना ख़ुद चुना हकीम था ।।
क्यों इश्क़ की गिरफ़्त में न वो कभी फँसा ,
क्या उसके पास दिल न था कि वह फ़हीम था ?
( नसीम =ठण्डी हवा / ददा =दरिंदा / अज़ीम =विशाल , महान / फ़हीम =बुद्धिमान )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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