● ग़ज़ल : 295 – शराब

                वो भले ही ख़राब है तो है ; तिश्नगी ए शराब है तो है ।। चाहे काँटों से है घिरा तो क्या , मुझको लाज़िम गुलाब है तो है ।। वो चुकाए...Read more

[] नज़्म : 08 – चाहत

है डर कि ख़ुद न बिगड़ जाऊँ साथ रह तेरे , और इतना ; फिर न सुधारे कभी सुधर पाऊँ । बुरा है तू ये ज़माने में शोर है हरसू , ये रोज़-रोज़ ही सुन-सुन के सोचता हूँ मैं ,...Read more

∆ सॉनेट : 14 – लगता था

कुछ-कुछ नहीं मुक़म्मल , नीले कमल सरीखा , कुछ देर बाद बिलकुल , ख़ूनी गुलाब जैसा , कुछ पल अमा के जलते , जुगनू के दल सरीखा , कुछ दिन बुझे चिराग़ों , में आफ़्ताब जैसा , पहले कभी-कभी कुछ...Read more

■ मुक्तक : 1010 – अपलक

देखो कि देखता हूँ मैं तुमको किस तरह से ? क्यों तुम न मुझको देखा करते हो इस तरह से ? सुधबुध को भूल अपनी अपलक निहारता है , कोई चकोर चंदा को ठीक जिस तरह से ।। -डॉ. हीरालाल...Read more

■ मुक्तक : 1009 – उलटा

सुलगकर मैं होता चलूँ और भी नम ।। मनाऊँ लगा क़हक़हा सारे मातम ।। मैं उलटा हूँ वो पीके लूँ ज़िंदगानी , जिसे चखते ही तोड़ देते हैं सब दम ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

■ 1008 – दुआएँ

कभी झुकने नहीं देतीं , उठाए मुझको रखती हैं ।। तुनुक मिटने नहीं देतीं , बनाए मुझको रखती हैं ।। वहाँ है मौत डग-डग पर , मैं जिन राहों पे चलता हूँ , दुआएँ हैं किसी की जो , बचाए...Read more