∆ सॉनेट : 14 – लगता था

कुछ-कुछ नहीं मुक़म्मल , नीले कमल सरीखा , कुछ देर बाद बिलकुल , ख़ूनी गुलाब जैसा , कुछ पल अमा के जलते , जुगनू के दल सरीखा , कुछ दिन बुझे चिराग़ों , में आफ़्ताब जैसा , पहले कभी-कभी कुछ...Read more