कुछ-कुछ नहीं मुक़म्मल , नीले कमल सरीखा ,
कुछ देर बाद बिलकुल , ख़ूनी गुलाब जैसा ,
कुछ पल अमा के जलते , जुगनू के दल सरीखा ,
कुछ दिन बुझे चिराग़ों , में आफ़्ताब जैसा ,
पहले कभी-कभी कुछ , गड्ढों में बावली सा ,
फिर कोई झील जैसा , फिर इक तलाब जैसा ,
कुछ वक़्त तक शहद सा , कुछ देर चाशनी सा ,
कुछ दिन बदामी शर्बत , कुछ दिन शराब जैसा ,
सोने की क़ीमती इक , भारी क़लम सा कोई ,
अनपढ़ के आगे कोई , मोटी किताब जैसा ,
लगता था मैं उन्हें तब , साजन-बलम सा कोई ,
लगता था जब हक़ीक़त , में उनको ख़्वाब जैसा ,
जब चाहते थे मुझको , वो बेपनाह यारों ,
करते थे जब महब्बत , मुझको वो आह यारों ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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