[] नज़्म : 08 – चाहत

है डर कि ख़ुद न बिगड़ जाऊँ साथ रह तेरे , और इतना ; फिर न सुधारे कभी सुधर पाऊँ । बुरा है तू ये ज़माने में शोर है हरसू , ये रोज़-रोज़ ही सुन-सुन के सोचता हूँ मैं ,...Read more