है डर कि ख़ुद न बिगड़ जाऊँसाथ रह तेरे ,
और इतना ; फिर न सुधारे कभी सुधर पाऊँ ।
बुरा है तू ये ज़माने में शोर है हरसू ,
ये रोज़-रोज़ ही सुन-सुन के सोचता हूँ मैं ,
कि वज़्ह क्या है जो तुझ तक मैं फिर भी तो आऊँ ?
न जानना है मुझे साथ क्या हुआ तेरे ,
जो एक फूल तू होकर बना है काँटा सा ?
ज़रूरी ये भी नहीं जानना मुझे तुझसे ,
कि जब तू बात करे है महब्बतों की भी ,
तो क्यों लगे है तू मारे है कसके चाँटा सा ?
न मुझको कहना है तुझसे कि देख मुझको भी –
ज़माने वालों ने तुझसे न कम सताया है ;
मैं फिर भी खाके क़सम रह रहा हूँ हँस-हँसके ,
ये सोचकर कि ” कभी मर्द रो नहीं सकता ” ,
भले ही सिर्फ़ शबोरोज़ दर्द पाया है ।।
सवाल मेरा था लेकिन जवाब दे तू गया ,
कहा न कुछ भी ग़लत जो कहा सही सारा ।
न जाने क्यों ? हाँ मगर , चाहता हूँ सच तुझको ;
मिले मक़ाम वही फिर बुलंदियों वाला ,
जहाँ पे था तू कभी सबकी आँख का तारा ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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