● ग़ज़ल : 295 – शराब

                वो भले ही ख़राब है तो है ; तिश्नगी ए शराब है तो है ।। चाहे काँटों से है घिरा तो क्या , मुझको लाज़िम गुलाब है तो है ।। वो चुकाए...Read more