हालात ने बदल दी , सूरत मेरी कुछ ऐसी ,
बस साल भर पुरानी , तस्वीर को मेरी सब ,
तक-तक के ग़ौर से भी , कहते हैं मैं नहीं हूँ ;
मैं झूठ बोलता हूँ , सच , झूठ बोलता हूँ ;
रुख़ से ये कोई राजा , तू शक़्ल से भिखारी ।।
तक चाल मेरी मुझको , कहते थे लोग मानो ,
जंगल में कोई बब्बर , इक शेर घूमता है ;
तक दौड़ मेरी मुझको , कहते थे सब हूँ चीता ,
अब मुझको कह रहे हैं , वो क़ैद में है बुलबुल ,
थकते न थे जो मुझको , कह-कह के इक शिकारी ।।
कंजूस मैं नहीं था , हरगिज़ मगर यक़ीनन ,
बेवज़्ह ख़र्च करने , वाला भी मैं नहीं था ,
तिस पर कमाई के सँग , थी कुछ बचत भी हर दिन ;
इक दिन न जाने मुझको , किसकी नज़र लगी जो ,
कोई मेरी तिजोरी , कर भागा साफ़ सारी ?
थोड़ा अजीब सा है , पूरा नया ज़माना ,
झाँके न दिल में ताड़े , बस जिस्म की बनावट ,
परखे न शख़्सियत को , रँग-रूप-वेश देखे ,
हालत को देख मेरी , मैं कह रहा हूँ कबसे ?
रिंगमास्टर हूँ मैं पर , समझे मुझे मदारी ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

 

This article has 2 comments

  1. B L Kumbhakar Reply

    आपकी तिजोरी कौन साफ कर सकता है ?

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