■ मुक्तक : 1011 – चढ़ाई

कुछ उधेड़ने को लम्हा-लम्हा है अजीब पर , मुझसे पूरे होशमंद रह बुनाई की गई ।। प्यार के लिए फ़क़त हाँ सिर्फ़ प्यार के लिए , मुझसे हर जगह पे बेतरह लड़ाई की गई ।। झोपड़ों से मैं डरा रहा...Read more