कुछ उधेड़ने को लम्हा-लम्हा है अजीब पर ,
मुझसे पूरे होशमंद रह बुनाई की गई ।।
प्यार के लिए फ़क़त हाँ सिर्फ़ प्यार के लिए ,
मुझसे हर जगह पे बेतरह लड़ाई की गई ।।
झोपड़ों से मैं डरा रहा अटारियों को तक ;
रंक की ज़मीं से शाह की बुलंदियों को तक ;
ख़्वाहिश ए खजूर लेके नीम के दरख़्तों पर ,
उम्र भर क़सम से बिन थके चढ़ाई की गई ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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