● ग़ज़ल : 296 – ख़्वाहिश

न आँधी से मैं घबराऊँ , न तूफ़ाँ ही डराएँ सच !! डराएँ अब नहीं मुझको , न जाने क्यों ख़ज़ाएँ सच ? क़सम जब-जब उठाता हूँ , मैं भूलों के न करने की , कि तब-तब और भी होने...Read more