न आँधी से मैं घबराऊँ , न तूफ़ाँ ही डराएँ सच !!

डराएँ अब नहीं मुझको , न जाने क्यों ख़ज़ाएँ सच ?

क़सम जब-जब उठाता हूँ , मैं भूलों के न करने की ,

कि तब-तब और भी होने , लगें मुझसे ख़ताएँ सच ।।

मेरे जलते हुए घर पर , वो ऐसे फेंकते पानी ,

लगे जैसे दियों को फूँककर बच्चे बुझाएँ सच ।।

चले आए हैं जबसे वो , मेरी हस्ती में हैराँ हूँ ,

मुझे हरगिज़ नहीं लगतीं , बलाएँ अब बलाएँ सच ।।

बड़े सजधज के वो जाने , कहाँ जाने को हैं निकले ,

कहो उनसे अकेले में , न मुझसे मिलने आएँ सच ?

इधर ख़ूब अक़्ल जाने है , वो मुड़कर भी न देखेंगे ,

उधर पूरे यक़ीं से दिल , उन्हें देवे सदाएँ सच !!

ज़माना आ चुका है वक़्ते रुख़्सत मुझसे मिलने को ,

मेरी अटकी है इसमें जाँ , कि वो भी देख जाएँ सच ।।

ये मेरी आख़िरी ख़्वाहिश , है जो मारें मुझे जाँ से ,

जनाज़े को मेरे काँधे , फ़क़त वे ही लगाएँ सच ।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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